आतप ताप गया, झंझावत और धूल।
आग उगलता सूरज छिपा जो चुभता जैसे शूल।
सर - सर पवन झकोरे झूम - झूम आये।
घन घनघोर घटा घुमड़ - घुमड़ छाये।
नाचे मन मोरा चले पुरवाई रे।
बरखा आई रे, बरखा आई रे।
बादल देख मोर मन गाए नाचे मगन मगन ।
पिहु - पिहु पपीहा की , गर्जत घन घोर घननन।
दादुर की ताल पर झींगुर की झिंगुर - झिंगुर ।
मेघ-राग छेड़े मेघा, गर्जन की सरगम ।
भू-लोक से सुर-लोक तक सावन झड़ी लगाई रे।
बरखा आई रे, बरखा आई रे।
झर - झर झरत मेघ, नवजल निर्मल।
मंद - मंद शीतल बयार, अम्बर अति उज्जवल।
सरिता, सर सराबोर सागर सम-धरा।
पल्लवित नवजीवन से पुलक पुञ्ज बसुन्धरा।
नव-अंकुरोँ ने ली है अंगड़ाई रे ।
बरखा आई रे, बरखा आई रे।
जुगुनू की चमक चाँद चपला सी चमक रही।
अम्बर से धरती तक दामिनि सी दमक रही।
हरित परिधान धान खतों ने ओढ़ा है।
इन्द्रधनुष अम्बर में तोरण सा छोड़ा है।
फूल मुस्कराए हर कली मुस्कराई रे ।
बरखा आई रे, बरखा आई रे।
खग, मृग, पतंग वृंद अंग - अंग फूले है।
फुहार हार मुक्तन के ज्योँ सावन के झूले है।
वन - उपवन कुसुम कुसुमित गुंजित मधुकर वृन्द।
सरित , सरोवर, कुमुद, कुमुदिनी जैसे कवि के छंद।
रसिक , रसाल , रसिक, रस डूबे महक रही अमराई रे ।
बरखा आई रे, बरखा आई रे।
alankaron ki chata ne kavita mein char chand laga diye hain .ati sundar.
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