Tuesday, 25 August 2015

नीम का पेड़ - 3

गतान्क से आगे ...............


माँ अब बूढी हो चली थी , बालोँ की सफेदी उसकी ढलती उम्र का अहसास कराती।  मगर स्वाभिमान के साथ तना  हुआ बदन, चश्मे के शीशोँ से झांकती ज्योति पुंज सरीखी ऑंखें।  उम्र के इस पड़ाव पर भी चेहरे की चमक कम नहीं हुई थी . तड़के ही जाग जाना घर की साफ़ - सफाई करना, दिनचर्या और  पूजा - पाठ से निपट कर चिड़ियोँ के दाना डालना , फिर कुछ खाना पीना।  इतने पर भी कहीं कुछ कमी थी. कोई कमी उसे सालती रहती अंदर ही अंदर कचोटती  रहती  ; उसके जीवन का सूनापन, उसके  अकेलेपन का अथाह सागर हिलोरें मारता।  जैसे उसे किसी का इंतजार था निगाहें द्वार पर टिकी रहती जैसे कोई अपना आने वाला है। वह  आयगा और गले से लग जायेगा। यही सोचते - सोचते  वह चमकते ज्योति पुंज बुझने से लगते।  वह सर झटक कर अपनी चाकरी  में लग जाती।   नीम के पेड़ को नीचे से ऊपर तक निहारती।  एक - एक टहनी एक - एक पत्ते को देखती  जैसे उनसे  गहरा नाता था। हर घोंसले पर नजर दौड़ती।  अगर कोई चिड़िया दिखाई न देती तो परेशान हो जाती इधर - उधर देखती, आवाज़   देती, कोई नया पंछी बसेरा डालता तो खुश हो जाती।  जब वह दाना डालती आवाज़ लगाती चिड़ियोँ के झुण्ड दाना चुगते , ख़ुशी  से नाचते।  गिल्लू और उसके बच्चे उछल - कूद करते।  वह बहुत खुश होती , चश्मे से झांकती आँखोँ में चमक दुगनी हो जाती।

      एक दिन उस पेड़ की छाया में माँ चिरनिद्रा में सो गयी।  प्राण पखेरू उड़ कर दूर अन्नत में विलीन हो चुके थे।  अजीब सा सन्नाटा छाया था।  न कोई चिड़िया चहकी , न बुलबुल , कोयल , मैना ने अपना मधुर संगीत छेड़ा , न किसी ने एक दाना खाया। गिल्लू अपने परिवार के साथ एक टहनी पर शांत बैठा था , न कोई उछल - कूद न कोई चंचलता।  बड़ी - बड़ी आँखों से हम सभी को ऐसे देख रहा था शायद कह रहा हो , " अब आये हो जब माँ चली गयी।  तुम्हारा इन्तजार करते - करते उसकी आँखें पथरा गयीं।  ऐसा कोई त्योहार न था जब  उन बूढी आँखों ने तुम्हारी बाट न जोही हो।  तुम्हारे बच्चों के लिए मिठाइयां और खिलोने सहेज कर न रखे हों । तुमसे तो अच्छे हम है जो उसके दुःख - सुख में साथ रहे , हमें देख कर वह मुस्करा तो लती थी।  एक बार भी माँ की  सुध न ली हम बुजुर्गों का बीता  हुआ कल हैं वह है तो हम हैं। " मन एक आत्मग्लानि से भर गया।  दिन  पेड़ की न  एक पत्ती हिली लग रहा था  हर पत्ती खामोश थी मानो पत्तियां हरी होने के पर भी सूख चुकी  थी ।  आखिर हो क्योँ न ,माँ जब से इस घर में ब्याह कर आई थी इसी पेड़  की छाया में उसने जीवन के इतने साल गुजारे  थे।  हर दुःख - सुख का साथी था वह, एक संरक्षक क तरह पल - पल जैसे ध्यान रखा है और माँ ने भी पूरा ध्यान रखा है।  उसके गिर्द मिट्टी का चबूतरा बना कर समय - समय पर लीपना पोतना करती, सूखी टहनियां हटाती।

     समय का चक्र घूमता गया दिन , महीने , साल बीतते  गए पंछी एक - एक कर बसेरा छोड़ते गए।  अब न भोर में बुलबुल मधुर संगीत छेड़ती , न कोयल और मैना  गाती, न संध्या को पंछियों की कलरव , लगता जैसे सब बीते दिनों की कहानी हो।  बस बचा था - नीम का विशाल पेड़, तन्हा अकेला और अगर  था तो  निशब्द सन्नाटा।   विशाल बाँहों सी टहनियां सूखकर सुकुड गयी और कमजोर होकर टूट कर गिरने लगी थीं ।   आखिर इस नश्वर संसार  क्या है जो नष्ट नहीं होता है ? सभी जड़ - चेतन , छोटे - बड़े , अमीर - गरीब सभी अन्तोगत्वा  अंत को प्राप्त होता ही है।  हाँ !यह भी सत्य है की जीवन चक्र चलता रहता है एक जाता है तो दूसरा उसकी जगह ले  लेता है।

    आंगन में नीम का नया पेड़ लग गया है।  वह भी फलेगा - फूलेगा उस पर भी चिड़ियाँ अपना आशियाँ बनाएंगी , बुलबुल फिर खिड़की पर गाएगी, मिठ्ठू अपनी सुंदरता से  सबका मन मोह लेगा, कोयल फिर बसंत का आवाहन करेगी।  चिड़ियोँ की  कलरव संध्या का  मधुर संगीत छेड़ेगी , फिर कोई गिल्लू अपने परिवार के साथ उछल कूद करेगा। कोई माँ अपने बच्चों को लोरी सुनाएगी, बच्चे नीम की ऊँची  विशाल  डालियों पर प्यार की पेंग बढ़ाएंगे , हर ओर खुशियां ही खुशियां होंगी। हाँ मगर माँ को अपने बच्चों का सालोँ साल इंतजार नहीं करना पड़ेगा।  वह माँ परिवार की गाड़ी  धुरी होगी।


इति शुभम्






    

       


1 comment:

  1. saty kaha.parivartan to aahi raha hai har kshetra main.bhavnatmak kahani hai dukh to hota hi hai .

    ReplyDelete