आतंकी , आततायी हर ओर घेरे है।
क्षत - बिक्षत तन बदन साँझ और सवेरे है।
छोड़ कर घर - द्वार अनजानी राहों पर।
विश्व है खड़ा हुआ अंधे चौराहों पर।
त्याग कर देश भेष, असंख्य पाँव चल पड़े।
ठाँव का पता नहीं, फिर भी वह निकल पड़े।
एक नन्हा फरिस्ता, मासूम , प्यारा , दुलारा।
नटखट वह चंचल " आयलान " असहाय बेचारा।
बहा ले गयीं उसको समंदर की लहरें।
पल में बिखरे लाखों सुन्दर सपने सुनहरे।
सागर किनारे पड़ा औंधा बेचारा।
जिन्दगी ढूंढती है ज्योँ कोई किनारा।
सागर न समां सका न धरती में ताव था।
अम्बर भी रो गया मानवता घाव था।
सम्बेदना बन बेदना आँखों से छलक गयी।
मानवता मोती बन गालों पर ढलक गयी।
चीत्कार उठीं दसों दिशाएं।
शोक से सरावोर चंचल हवाएं।
खेलता है अब ईश्वर के आँगन में।
गूंजती किलकारियाँ अब अनंत अम्बर में।
फूल बन खिलेगा वह, अब हर बसंत में।
फूलों की मुस्कान में और सुगंध में।
क्षत - बिक्षत तन बदन साँझ और सवेरे है।
छोड़ कर घर - द्वार अनजानी राहों पर।
विश्व है खड़ा हुआ अंधे चौराहों पर।
त्याग कर देश भेष, असंख्य पाँव चल पड़े।
ठाँव का पता नहीं, फिर भी वह निकल पड़े।
एक नन्हा फरिस्ता, मासूम , प्यारा , दुलारा।
नटखट वह चंचल " आयलान " असहाय बेचारा।
बहा ले गयीं उसको समंदर की लहरें।
पल में बिखरे लाखों सुन्दर सपने सुनहरे।
सागर किनारे पड़ा औंधा बेचारा।
जिन्दगी ढूंढती है ज्योँ कोई किनारा।
सागर न समां सका न धरती में ताव था।
अम्बर भी रो गया मानवता घाव था।
सम्बेदना बन बेदना आँखों से छलक गयी।
मानवता मोती बन गालों पर ढलक गयी।
चीत्कार उठीं दसों दिशाएं।
शोक से सरावोर चंचल हवाएं।
खेलता है अब ईश्वर के आँगन में।
गूंजती किलकारियाँ अब अनंत अम्बर में।
फूल बन खिलेगा वह, अब हर बसंत में।
फूलों की मुस्कान में और सुगंध में।
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