Tuesday, 13 October 2015

जयति - जयति जय मात भारती

हिमगिरि शिखर किरीट सम राजत, तेरे  उन्नत भाल।
शस्य श्यामला ओढ़े चुनरिया, रवि - शशि नयन विशाल।
गंगा - जमुना नीर क्षीर सम पावन पियूष समान।
मलयज पवन बहे  सुगन्धित नवजीवन प्राण समान।
सूरज सजा आरती आये पंछी गायें  राग विहान।
जयति - जयति जय मात भारती , जय भारत भूमि महान।   ------ll १ ll


सागर तेरे  पाँव पखारे चंदा तिलक करे।
केसरिया परिधान पहिने, तारे मांग भरें।
कोयल गाये गीत प्रेम के,  आँगन नाचें मोर।
बुलबुल के  गीतों को सुनकर होता है नित भोर।
तेरी लालिमा से   अरुणोदय, है तेरा तेज  महान।
 जयति - जयति जय मात भारती , जय भारत भूमि महान।   ------ll २  ll

शरद , शिशिर , हेमन्त, बसन्त ऋतु गर्मी बर्षा संग।
होली, दिवाली, ईद,  दशहरा तेरे अनेकों  रंग।
जंहाँ फाग  खेलें मनमोहन, शंकर भस्म रमाये।
गौतम, नानक की  वाणी विश्व शान्ति पथ पढ़ाये।
स्वयं सारथी  बन अर्जुन के रथ हाँका   भगवान।
जयति - जयति जय मात भारती , जय भारत भूमि महान।   ------ll ३   ll


रंग - बिरंगे फूलों को,  झूले  पवन झुलायें ।
बलखातीं - इठलाती नदियाँ कलकल बहतीं जायें।
कुसुम, कली इतराएँ तितलियाँ, उड़तीं वन - उपवन।
भ्रमर गीत गुंजित, हर फूल - फूल कानन।
झर - झर झरें मेघ कर गर्जन, हीरक हार समान।
जयति - जयति जय मात भारती , जय भारत भूमि महान।   ------ll ४  ll



जहाँ  प्रेम अलख गूंजे घर - घर , कृष्ण सुनाते हैं गीता।
जहाँ राम बसे नर - नर में हैं, नारी में बसती हैं सीता।
जहाँ वीर शिवा, अर्जुन, प्रताप, दानवीर कर्ण धनुर्धारी।
चौदह वर्ष बसे  वन में पुत्र राम आज्ञाकारी।
सवा लाख से लड़े एक, जय गुरु गोविन्द महान
जयति - जयति जय मात भारती , जय भारत भूमि महान।   ------ll ५   ll



भिन्न भेष , भाषा अनेक हैं , भिन्न रूप और रंग।
भिन्न खान - पान, मर्यादा फिर भी हम अभिन्न।
एक कुञ्ज के पुष्प अनेक है, एक शरीर के अंग।
एक हमारी भारत माता, हम अलग - अलग पर संग।
'अनेकता में एकता '  ही है अपनी शान।
जयति - जयति जय मात भारती , जय भारत भूमि महान।   ------ll ६   ll







Thursday, 10 September 2015

नन्हा फरिस्ता "आयलान "

आतंकी , आततायी हर ओर घेरे है।
क्षत - बिक्षत तन बदन साँझ और सवेरे है।
छोड़ कर घर - द्वार अनजानी राहों पर।
विश्व है खड़ा हुआ अंधे चौराहों पर।

                        त्याग कर देश भेष, असंख्य पाँव चल पड़े।
                        ठाँव का पता नहीं, फिर  भी वह निकल पड़े।
                        एक नन्हा फरिस्ता, मासूम , प्यारा ,  दुलारा।
                        नटखट वह चंचल " आयलान " असहाय बेचारा।

बहा ले गयीं उसको समंदर की लहरें।
पल में बिखरे लाखों  सुन्दर सपने सुनहरे।
सागर किनारे पड़ा औंधा बेचारा।
जिन्दगी ढूंढती है ज्योँ कोई किनारा।

                       सागर न समां  सका  न धरती  में ताव था।
                       अम्बर भी रो गया मानवता  घाव था।
                       सम्बेदना बन बेदना आँखों से छलक गयी।
                       मानवता मोती बन गालों पर ढलक गयी।

चीत्कार  उठीं दसों  दिशाएं।
शोक से सरावोर चंचल  हवाएं।
खेलता   है अब ईश्वर   के आँगन में।
गूंजती किलकारियाँ अब अनंत अम्बर में।
फूल बन खिलेगा वह, अब हर बसंत में।
फूलों की मुस्कान में और सुगंध में।




   


         

Wednesday, 26 August 2015

माँ

काशी, मथुरा तेरे पद पंकज। 
पूजा , आरती , मंत्र जाप सब। 
तेरे आँचल में हैं, मंदिर और  गुरुद्वारे । 
आशीष तेरे माँ, धरती स्वर्ग उतारे।
परम पुनीत तेरी पद रज, ज्यों रोली और चन्दन।
कोटि - कोटि बंदन माँ तुझको, कोटि - कोटि माँ बंदन।   ----१

                   शीतल, मलयज पवन बहे ज्यों। 
                   मरुभूमि में गंग - जमुन ज्यों। 
                  अम्बर सा अनंत  तेरा आँचल। 
                   ज्यों वरद् हस्त मुझ पर हर पल। 
                   एक प्यार की कोमल थपकी पर, मैं  बार - बार बारुं जीवन। 
                   कोटि - कोटि बंदन माँ तुझको, कोटि - कोटि माँ बंदन। ---२ 

हर श्वास - निःश्वास में तू ही माँ। 
हर बिश्वास में माँ, अहसास में माँ। 
तू ममता का उच्छल उदधि।  
जीवन में जीवन की परधि।   
तू है हर पग , डग , मग  पर पल - पल आलम्बन। 
 कोटि - कोटि बंदन माँ तुझको, कोटि - कोटि माँ बंदन। ----३ 

                   ममता, करुणा की है मूरत तू।
                   भगवान तू ही , भगवान की सूरत तू।
                   है निश्छल प्रेम की धार तू ही।
                   है बसंत तू ,  बहार तू ही।
                   तेरे   प्यार , दुलार का यह अटूट बंधन।
                   कोटि - कोटि बंदन माँ तुझको, कोटि - कोटि माँ बंदन। …… ४











Tuesday, 25 August 2015

नीम का पेड़ - 3

गतान्क से आगे ...............


माँ अब बूढी हो चली थी , बालोँ की सफेदी उसकी ढलती उम्र का अहसास कराती।  मगर स्वाभिमान के साथ तना  हुआ बदन, चश्मे के शीशोँ से झांकती ज्योति पुंज सरीखी ऑंखें।  उम्र के इस पड़ाव पर भी चेहरे की चमक कम नहीं हुई थी . तड़के ही जाग जाना घर की साफ़ - सफाई करना, दिनचर्या और  पूजा - पाठ से निपट कर चिड़ियोँ के दाना डालना , फिर कुछ खाना पीना।  इतने पर भी कहीं कुछ कमी थी. कोई कमी उसे सालती रहती अंदर ही अंदर कचोटती  रहती  ; उसके जीवन का सूनापन, उसके  अकेलेपन का अथाह सागर हिलोरें मारता।  जैसे उसे किसी का इंतजार था निगाहें द्वार पर टिकी रहती जैसे कोई अपना आने वाला है। वह  आयगा और गले से लग जायेगा। यही सोचते - सोचते  वह चमकते ज्योति पुंज बुझने से लगते।  वह सर झटक कर अपनी चाकरी  में लग जाती।   नीम के पेड़ को नीचे से ऊपर तक निहारती।  एक - एक टहनी एक - एक पत्ते को देखती  जैसे उनसे  गहरा नाता था। हर घोंसले पर नजर दौड़ती।  अगर कोई चिड़िया दिखाई न देती तो परेशान हो जाती इधर - उधर देखती, आवाज़   देती, कोई नया पंछी बसेरा डालता तो खुश हो जाती।  जब वह दाना डालती आवाज़ लगाती चिड़ियोँ के झुण्ड दाना चुगते , ख़ुशी  से नाचते।  गिल्लू और उसके बच्चे उछल - कूद करते।  वह बहुत खुश होती , चश्मे से झांकती आँखोँ में चमक दुगनी हो जाती।

      एक दिन उस पेड़ की छाया में माँ चिरनिद्रा में सो गयी।  प्राण पखेरू उड़ कर दूर अन्नत में विलीन हो चुके थे।  अजीब सा सन्नाटा छाया था।  न कोई चिड़िया चहकी , न बुलबुल , कोयल , मैना ने अपना मधुर संगीत छेड़ा , न किसी ने एक दाना खाया। गिल्लू अपने परिवार के साथ एक टहनी पर शांत बैठा था , न कोई उछल - कूद न कोई चंचलता।  बड़ी - बड़ी आँखों से हम सभी को ऐसे देख रहा था शायद कह रहा हो , " अब आये हो जब माँ चली गयी।  तुम्हारा इन्तजार करते - करते उसकी आँखें पथरा गयीं।  ऐसा कोई त्योहार न था जब  उन बूढी आँखों ने तुम्हारी बाट न जोही हो।  तुम्हारे बच्चों के लिए मिठाइयां और खिलोने सहेज कर न रखे हों । तुमसे तो अच्छे हम है जो उसके दुःख - सुख में साथ रहे , हमें देख कर वह मुस्करा तो लती थी।  एक बार भी माँ की  सुध न ली हम बुजुर्गों का बीता  हुआ कल हैं वह है तो हम हैं। " मन एक आत्मग्लानि से भर गया।  दिन  पेड़ की न  एक पत्ती हिली लग रहा था  हर पत्ती खामोश थी मानो पत्तियां हरी होने के पर भी सूख चुकी  थी ।  आखिर हो क्योँ न ,माँ जब से इस घर में ब्याह कर आई थी इसी पेड़  की छाया में उसने जीवन के इतने साल गुजारे  थे।  हर दुःख - सुख का साथी था वह, एक संरक्षक क तरह पल - पल जैसे ध्यान रखा है और माँ ने भी पूरा ध्यान रखा है।  उसके गिर्द मिट्टी का चबूतरा बना कर समय - समय पर लीपना पोतना करती, सूखी टहनियां हटाती।

     समय का चक्र घूमता गया दिन , महीने , साल बीतते  गए पंछी एक - एक कर बसेरा छोड़ते गए।  अब न भोर में बुलबुल मधुर संगीत छेड़ती , न कोयल और मैना  गाती, न संध्या को पंछियों की कलरव , लगता जैसे सब बीते दिनों की कहानी हो।  बस बचा था - नीम का विशाल पेड़, तन्हा अकेला और अगर  था तो  निशब्द सन्नाटा।   विशाल बाँहों सी टहनियां सूखकर सुकुड गयी और कमजोर होकर टूट कर गिरने लगी थीं ।   आखिर इस नश्वर संसार  क्या है जो नष्ट नहीं होता है ? सभी जड़ - चेतन , छोटे - बड़े , अमीर - गरीब सभी अन्तोगत्वा  अंत को प्राप्त होता ही है।  हाँ !यह भी सत्य है की जीवन चक्र चलता रहता है एक जाता है तो दूसरा उसकी जगह ले  लेता है।

    आंगन में नीम का नया पेड़ लग गया है।  वह भी फलेगा - फूलेगा उस पर भी चिड़ियाँ अपना आशियाँ बनाएंगी , बुलबुल फिर खिड़की पर गाएगी, मिठ्ठू अपनी सुंदरता से  सबका मन मोह लेगा, कोयल फिर बसंत का आवाहन करेगी।  चिड़ियोँ की  कलरव संध्या का  मधुर संगीत छेड़ेगी , फिर कोई गिल्लू अपने परिवार के साथ उछल कूद करेगा। कोई माँ अपने बच्चों को लोरी सुनाएगी, बच्चे नीम की ऊँची  विशाल  डालियों पर प्यार की पेंग बढ़ाएंगे , हर ओर खुशियां ही खुशियां होंगी। हाँ मगर माँ को अपने बच्चों का सालोँ साल इंतजार नहीं करना पड़ेगा।  वह माँ परिवार की गाड़ी  धुरी होगी।


इति शुभम्






    

       


Monday, 3 August 2015

नीम का पेड़ - २

गतान्क  आगे ………


हम सभी बहिन उसकी छाया में कहते खेलते बड़े हुए।  गर्मी हो या सर्दी, बसंत हो पतझड़, धूप हो या बरसात, वह हमारे सभी सुख दुःख का साथी था।  ऐसा लगता जैसे उससे जन्म- जन्मांतरों का नाता हो, उसकी लम्बी शाखाएं  लम्बी विशाल भुजाओं की तरह लगती मानो  गोद में भरने को आतुर हो।  हम उस पर चढ़ जाते।  कभी डाल पकड़ कर झूलते, कभी एक शाख से दूसरी पर चढ़ जाते मोटी शाख पर ऐसे लेट जाते जैसे किसी आत्मीय की गोद में लेटे हों।  झूला डाल लेते और लम्बी लम्बी पींगे बढ़ाते।  उसकी शीतल घनी छाया, महकती हवा परमानन्द की अनुभूति प्रदान कराती।  आज  भी उन बीते पलों की यादें मेरे अंतर्मन  समाई हुई है।   आँख  बंद कर उन पलों याद करता हूँ तो एक अजीब सी हूंक उठती है,  क्या दिन  थे वह ? न  कोई चिंता, न कोई फिक्र।

         वह सिर्फ पेड़ ही नहीं था हमारे जीवन का  अहम हिस्सा था , सुबह की दातून से शाम के मच्छर, मक्खी तक भागने में।  हर बीमारी में कभी पत्तियां, तो कभी फूल, कभी छाल,  कभी फल, कपड़ों के कीड़ों से लेकर आनाज के कीड़ों तक  या योँ कहे उसने अपना सर्वस्व हम पर न्योछावर कर दिया था।  हाँ, मगर कड़वा पर अनेक गुणों से भरपूर, बिल्कुल नारियल की तरह बाहर से कड़क अंदर से मीठा ; जैसे कि एक पिता अपने बच्चों को डांटता है, फटकारता है  जिससे वे  सही रास्ते पर चलें। 

         दिन, महीने, साल गुजरते गए, हम सभी बड़े हो गए, नन्ही चिड़िया बड़ी हो गयी, गिल्लू बड़ा हो गया सबने अपने - अपने परिवार बसा लिए।  एक दिन नन्ही चिड़िया उड़ गयी।  गिल्लू का परिवार बड़ा हो गया।  हम भी रोजी - रोटी की तलाश में घर छोड़ गए, पीछे छूट गए , माँ , गिल्लू , कुछ चिड़ियाँ, आँगन  और  नीम का पेड़। माँ जो हमारे जीवन का अंग थी या यूँ कहें हम माँ के जीवन का  हिस्सा थे सब एक -एक कर छोड़ गए।  माँ हमारी ही माँ नहीं थी , बल्कि पेड़  रहने हर पशु पक्षी का ध्यान रखती।  सबको दाना डालती ,  छत पर पानी रखती।  वह सब को पहचानती थी और वे सब उसे  पहचानते थे।  माँ चावल  साफ़ करती तो चिड़ियों का झुण्ड आकर चहकने लगता, वह उन्हें दाने डालती, गिल्लू का पूरा परिवार आ  जाता, उसके बच्चे भी उसी की तरह चंचल और सुन्दर छुपकर बर्तन से दाने खाने की कोशिश करता माँ 'शू ' कर भागने की नाकाम कोशिश करती और मुस्कराकर रह जाती।          






                              

Sunday, 2 August 2015

नीम का पेड़


मेरे आँगन में एक नीम का पेड़ था, घनी छायादार , विशाल लम्बी - लम्बी शाखाएँ, मजबूत तना। वह कितने ही पंछियों का बसेरा था वह कितनों  को आश्रय देता , कितने पंछियों के टहनियों पर घोंसले थे , न जाने कितने कोटरों में रहते, कुछ तो रात को आते और भोर होते ही उड़ जाते।  बड़ी ही चहल - पहल रहती, अल -सुबह सारे पक्षी जग जाते।  चिड़ियों की चीं - चीं लगता भोर राग छेड़ा है, एक अनोखा आनंद प्राप्त होता, अजीब आत्मिक, आध्यात्मिक शांति प्रदान करती, और संध्या समय पंछियों की कलरब लगता असंख्य घंटियां बज रही हो,  मंदिर में संध्या आरती हो रही और बटुक मंत्र  जाप कर रहे है।

         एक थी बुलबुल, जो उसी नीम के पेड़ पर रहती।   अरुणोदय के से पहले ही हमारी खिड़की पर आ जाती और बड़े मधुर गीत गाती मानो हमें जगा रही हो।  मानो  गा  रही हो ,
                                              "भोर भई अब जागो लाला , चारों तरफ है फैला उजाला। 
                                               खिले फूल कलियाँ मुस्काई, गूंजे भ्रमर ज्यों बजे शहनाई।     
                                               नाचे मोर और  कोयल गाए , पंछी मधुर गीत सुनाए। 
                                               सूरज उगा,  छिपे तारागण, गयी निशा है फैला उजाला। 
                                               भोर भई   ………                                                    ।" 
 उसकी चुहुल सभी की बहुत भाती  थी।  जैसे ही मैं उसके पास जाता तो फुर्र से उड़ जाती और पेड़ की शाख पर जा बैठती , "मानो  कह रही पकड़ लो मुझे।"  मैं निराश हो जाता , सोचता , "काश ! मेरे भी पंख होते तो उड़ कर पकड़ लेता।  मैं भी शाख पर जा बैठता, दूर अनंत आकाश में स्वछंद उड़ता।"  मुझे लाचार देख कर फिर नीचे आ जाती। एक था मिठ्ठू तोता पेड़ की एक कोटर में उसका घर था।  सुन्दर, चटकीली, तीखी, मुड़ी हुई  लाल चोंच, गले में लाल रंग का छल्ला , हरे पंखों के बीच लाल छल्ला लगता ईश्वर ने उसे कोई अनोखा उपहार देकर जमीन पर भेजा है।  हाँ, और एक था गिल्लू।  बड़ी - बड़ी चंचल ऑंखें, लम्बी झबरी पूँछ, बदन पर काली धुसरी सिर से पूँछ तक धारियां।  एक टहनी से दूसरी पर उछल - कूद करता, आँगन से कुछ खाने की चीज लेकर  भाग जाता।  बहुत ही चंचल था वह , अगर मैं खाने का टुकड़ा डाल देता लेकर डाल पर जा बैठता। शनैः - शनैः हमारी मित्रता हो गई, मैं खाने को बैठता तो पेड़ से उतर कर मेरे पास बैठ जाता मुझे निहारता।  मैं भी खाने के टुकड़े कर डाल देता।  पेड़ पर रहने वाला एक अच्छा खासा समाज था - रानी बुलबुल , मिठ्ठू तोता , गिल्लू गिलहरी, कुकू कोयल, चीं - चीं मैना  और भी बहुत  से पंछियों  परिवार।


                                                                                                   क्रमशः -------------









Wednesday, 29 July 2015

सावन ऋतु आई




समीर नीर बोर बहे , बदरी है घिर आई।
झर - झर  कर झरत मेघ सावन ऋतु आई।
करे शोर मोर , दादुर, चातक, घन घोर गरज।
मैना , शुक , कोयल गाये , पंछियोँ की कलरव।
मधुकर , पतंगवृन्द गुंजत कुसुम कुञ्ज।
जुगुनू की चमक ज्योँ कोटि कोटि ज्योतिपुंज।
उफनें है सरिता, सर, धरती है समाई।
सावन ऋतु आई ,   सावन ऋतु आई।


निर्झर से झरत मेघ हीरक के हार ज्योँ।
सर - सर कर बहे पवन , गावे मल्हार ज्योँ।
ओझल रवि , शशि  ओझल खगमण्डल।
घन घनघोर घिरे , ओझल नभमण्डल।
नवयौवना धरती , हरित  श्याम छटा छाई।
सावन ऋतु आई , सावन ऋतु आई।


टूटे सब तट कबंध , टूटे सब बंधन हैं।
टूटी सब मर्यादाएं , जागे नवजीवन हैं।
तरणी तट रहित तरे , धरती सम-नीर है।
नीर है , या  समीर है ,  नीर में समीर है या समीर में ही नीर है।
बहे समीर ज्योँ , ले गोरी अंगड़ाई।
सावन ऋतु आई , सावन ऋतु आई।