गतान्क आगे ………
हम सभी बहिन उसकी छाया में कहते खेलते बड़े हुए। गर्मी हो या सर्दी, बसंत हो पतझड़, धूप हो या बरसात, वह हमारे सभी सुख दुःख का साथी था। ऐसा लगता जैसे उससे जन्म- जन्मांतरों का नाता हो, उसकी लम्बी शाखाएं लम्बी विशाल भुजाओं की तरह लगती मानो गोद में भरने को आतुर हो। हम उस पर चढ़ जाते। कभी डाल पकड़ कर झूलते, कभी एक शाख से दूसरी पर चढ़ जाते मोटी शाख पर ऐसे लेट जाते जैसे किसी आत्मीय की गोद में लेटे हों। झूला डाल लेते और लम्बी लम्बी पींगे बढ़ाते। उसकी शीतल घनी छाया, महकती हवा परमानन्द की अनुभूति प्रदान कराती। आज भी उन बीते पलों की यादें मेरे अंतर्मन समाई हुई है। आँख बंद कर उन पलों याद करता हूँ तो एक अजीब सी हूंक उठती है, क्या दिन थे वह ? न कोई चिंता, न कोई फिक्र।
वह सिर्फ पेड़ ही नहीं था हमारे जीवन का अहम हिस्सा था , सुबह की दातून से शाम के मच्छर, मक्खी तक भागने में। हर बीमारी में कभी पत्तियां, तो कभी फूल, कभी छाल, कभी फल, कपड़ों के कीड़ों से लेकर आनाज के कीड़ों तक या योँ कहे उसने अपना सर्वस्व हम पर न्योछावर कर दिया था। हाँ, मगर कड़वा पर अनेक गुणों से भरपूर, बिल्कुल नारियल की तरह बाहर से कड़क अंदर से मीठा ; जैसे कि एक पिता अपने बच्चों को डांटता है, फटकारता है जिससे वे सही रास्ते पर चलें।
दिन, महीने, साल गुजरते गए, हम सभी बड़े हो गए, नन्ही चिड़िया बड़ी हो गयी, गिल्लू बड़ा हो गया सबने अपने - अपने परिवार बसा लिए। एक दिन नन्ही चिड़िया उड़ गयी। गिल्लू का परिवार बड़ा हो गया। हम भी रोजी - रोटी की तलाश में घर छोड़ गए, पीछे छूट गए , माँ , गिल्लू , कुछ चिड़ियाँ, आँगन और नीम का पेड़। माँ जो हमारे जीवन का अंग थी या यूँ कहें हम माँ के जीवन का हिस्सा थे सब एक -एक कर छोड़ गए। माँ हमारी ही माँ नहीं थी , बल्कि पेड़ रहने हर पशु पक्षी का ध्यान रखती। सबको दाना डालती , छत पर पानी रखती। वह सब को पहचानती थी और वे सब उसे पहचानते थे। माँ चावल साफ़ करती तो चिड़ियों का झुण्ड आकर चहकने लगता, वह उन्हें दाने डालती, गिल्लू का पूरा परिवार आ जाता, उसके बच्चे भी उसी की तरह चंचल और सुन्दर छुपकर बर्तन से दाने खाने की कोशिश करता माँ 'शू ' कर भागने की नाकाम कोशिश करती और मुस्कराकर रह जाती।
good speed sir.....carry on....
ReplyDeleteprakritik prem.kalpna ki oonchi udan.sundar.
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