Wednesday, 29 July 2015

सावन ऋतु आई




समीर नीर बोर बहे , बदरी है घिर आई।
झर - झर  कर झरत मेघ सावन ऋतु आई।
करे शोर मोर , दादुर, चातक, घन घोर गरज।
मैना , शुक , कोयल गाये , पंछियोँ की कलरव।
मधुकर , पतंगवृन्द गुंजत कुसुम कुञ्ज।
जुगुनू की चमक ज्योँ कोटि कोटि ज्योतिपुंज।
उफनें है सरिता, सर, धरती है समाई।
सावन ऋतु आई ,   सावन ऋतु आई।


निर्झर से झरत मेघ हीरक के हार ज्योँ।
सर - सर कर बहे पवन , गावे मल्हार ज्योँ।
ओझल रवि , शशि  ओझल खगमण्डल।
घन घनघोर घिरे , ओझल नभमण्डल।
नवयौवना धरती , हरित  श्याम छटा छाई।
सावन ऋतु आई , सावन ऋतु आई।


टूटे सब तट कबंध , टूटे सब बंधन हैं।
टूटी सब मर्यादाएं , जागे नवजीवन हैं।
तरणी तट रहित तरे , धरती सम-नीर है।
नीर है , या  समीर है ,  नीर में समीर है या समीर में ही नीर है।
बहे समीर ज्योँ , ले गोरी अंगड़ाई।
सावन ऋतु आई , सावन ऋतु आई।












Tuesday, 21 July 2015

मैं नारी हूँ

पति को छुड़ा लाऊँ यमराज से सावित्री मैं हूँ।
देवोँ की पूज्या वेद माता गायत्री मैं  हूँ।
मैं हूँ , लक्ष्मी , नारायणी , कमलासना कमला।
मैं हूँ , ज्ञान की  देवी  शारदा, विमला।


मैं ही , दुर्गा , काली , भवानी शक्ति हूँ।
मैं ही, ममता, करुणा, दया, और भक्ति हूँ।
मैं ही , राम , कृष्ण, गौतम , ईशु की जननी हूँ।
मैं ही , नर्मदा, गंगा, मन्दाकिनी , वैतरणी हूँ।


मैं ही, निमित्त हूँ संसार के बिस्तार  का।
मुझसे  ही है, प्रवाह संसार के सार का।
मुझसे ही पुष्पित पल्लवित हर जीवन, नवजीवन है।
अगर मैं हूँ तो तुम हो, मुझसे यह जीवन संजीवन है।

मैं चाहूँ तो त्रिदेव को पलने में झुला  दूँ।
मैं बनकर गोपी गोविन्द को नाच नचा दूँ।
मैं मातृतुल्य आदरणीया, वंदनीया हूँ।
देवता बसते वहाँ , जहाँ पूजनीया हूँ।

मैं पद्मिनी हूँ , मुझे तुम, छू न सकोगे।
जौहर के तेज को  सह न सकोगे
मैं नारी हूँ, नारी का सम्मान करो।
अपने नहीं , इसके अस्तित्य पर अभिमान करो।
अपने नहीं , इसके अस्तित्य पर अभिमान करो.





Saturday, 18 July 2015

बेटी

परिवार  का परिवार से सेतुबंध है   बेटी।
ममता, करुणा, प्रेम  सिन्धु है  बेटी।
लोक से परलोक तक आलोक है बेटी।
जीवन में पहली किरण है  भोर की  बेटी।

बेटी की किलकारियां गूंजती जिस घर है,

बेटी से हर घर, वास्तव में घर है।




धरती पर स्वर्ग का अहसास है बेटी।
जीवन में निश्छल प्रेम का बिश्वास है   बेटी।
तपती हुई धरती पर शीतल फुहार सी बेटी।
मरुस्थल में महकती बहार सी बेटी।

बेटी से माँ - बाप का प्यार अमर है,

बेटी से हर घर, वास्तव में घर है।




विधि के विधान का वरदान है बेटी।
हर हार की जीत का हार है बेटी।
मान और सम्मान, अभिमान है बेटी।
मानव को भगवान का उपहार है बेटी।

बेटी है तो घर मस्जिद है मंदिर है।

बेटी से हर घर, वास्तव में घर है।




जीवन में जीवन का संचार है बेटी।
संसार के बिस्तार का आधार है बेटी।
प्रेम का अटूट बंधन है बेटी।
हृदय के स्पंदन का स्पंदन है बेटी।

बेटी है तो मानव मर कर भी अमर है।

बेटी से हर घर, वास्तव में घर है।


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Sunday, 12 July 2015

पेन्सिल रानी








सुनो ! सुनो ! मेरी कहानी, मेरी कहानी मेरी जुबानी।
मैं थी पेड़ एक जंगल का, जंगल में मुझको मंगल था।
झूम - झूम कर मैं इठलाती , मुझे गोद  में पवन झूलती।
खुली हवा में लेती सांसें , गाती गीत और करती बातें।


शेर , लोमड़ी , बंदर मामा, उछल- कूद करता हंगामा।
कालू भालू, चीता, हाथी, थे जंगल में संगी - साथी।
तोता , कोयल , मैना, मोर , खूब मचाते मिलकर शोर।

एक दिन आया मोटा लाला, बड़ी तोंद और चश्मा काला।
गोल - मटोल था जैसे आलू , चले ठुमककर जैसे भालू।
मुझे देखकर वह मुस्काया , मुझपर उसने तरस न खाया।

मैं बहुत रोई चिल्लाई , मदद - मदद आवाज़ लगाई।
छूट गए सब संगी - साथी , बंदर, भालू, चीता, हाथी
छोटे टुकड़ों में कटवाया , काट - छांट कर मुझे सुखाया।

डाली बत्ती रंगबिरंगी , हरी, लाल , पीली,  नारंगी।
आसमानी , नीली , बैगनी, रंगभरी जैसे सतरंगी।
नया रूप देखा शरमाई ,अपनी किस्मत पर इतराई।


                                               
                                                    चिंटू , पिंटू , मिंटू , बबली , अंजू , मंजू , बिट्टू लवली।
जुड़ गया मेरा सबसे नाता , लिखे लेख कोई चित्र बनाता।
प्यारी मैं बन गयी सबकी, बंटू , डोली , रोली , छुटकी।

बच्चो ! अगर कुछ पाना है, दुःख - कष्टोँ से न घबराना है.
लालाजी की मैं आभारी , जिसने मेरी किस्मत संभारी।
पूरी हुई मेरी कहानी, मैं हूँ तुम्हारी पेंसिल रानी।





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Saturday, 11 July 2015

यमराज से टक्कर





एक दिन यमराज से,  टकरा गया मैं ।
थोड़ा झिझका, डरा और घबरा गया मैं । 

मैंने पूंछा ," भाई आप कौन हैं ?

ऐसे खड़े हैं क्योँ मौन हैं "?

मुस्करा कर बोले वह," मुझे नहीं पहचानते हो ?

क्या वास्तव में मुझे नहीं जानते हो ?"

मैंने अपनी अक्ल के दौड़ाए  घोड़े,

ठोड़ी  खुजाई , भौहें सिकोड़ी , थोड़े होंठ मोड़े। 

ताका आकाश को , कुछ बुदबुदाया। 

इधर उधर देखा और सिर  खुजाया। 

बोला ," क्या किसी तबेले से आ रहे हो ?

भटके हुए राही हैं, या कहीं जा रहे हो ?"

वह बोले ," वत्स ! यमराज है, हम। 
यमपुरी के महाराज हैं, हम। 

यमदंडधारी, मृत्यु के स्वामी हमी  हैं। 

अब तो मन में कोई शंका नहीं हैं ?"

सुनकर उनकी बात, डर कर दूर भागा। 

सोंचा , क्या टकराने को  लिए मैं ही बचा था, अभागा ?

वह बोले ," डरो नहीं वत्स ! तेरा नम्बर नहीं ,

यम हैं हम,  यह भी सही हैं । "

डर दूर भागा, उनकी यह बात सुनकर। 

हम भी खड़े हो गए, कुछ अस्वस्त होकर। 

"झूठे , फरेबी , मक्कार , धोकेबाज,  जो नेता हमको लूटते हैं ?

खटमल, पिस्सुओं जैसे खून चूसते हैं। 

या इलाज़ के नाम पर ठगने बाले डॉक्टर। 

क्या उनका है नंबर ?

या स्वछन्द जो घूमते क़ातिल, लुटेरे ?

या भ्रष्ट रिश्वतखोर जो हैं घनेरे ?"

वह बोले ,"व्यापम की वजह से अभी फुर्सत नहीं है,

अभी इनका नम्बर नहीं है। 






Sunday, 5 July 2015

महाकाल फिर बनो




हे ! जटाजूट, कर्पूरगौर, हे ! कैलाशपति,  केदारनाथ।
शूलपाणि, हे ! शिव शम्भू,  हे ! विश्वनाथ,  हे ! नागेश्वर।
हे ! कृपालु  हे ! गंगाधर , हे चंद्रमौलि, बाघम्बरधर।
हे ! अभयङ्कर , त्रयंबकेश्वर , हे ! कामारि, हे ! घुश्मेश्वर।
हे ! नीलकंठ  हे ! नागनाथ ,  हे !सोमनाथ  हे !  भस्मेश्वर।
हे ! बैद्यनाथ , हे ! सतीपति,  हे !गौरानाथ,  हे ! नंदेश्वर।
हे ! अंनग-रिपु , हे ! त्रिलोचन,  हे ! डमरूधर हे! भीमेश्वर ।
हे ! मृत्युञ्जय हे ! महादेव , हे ! चिदानंद जय विश्वम्भर।
हे !  आशुतोष, हे ! लिंगराज, हे ! पशुपति  हे ! परमेश्वर।
हे ! उमापति, हे ! बृषवाहन, पिनाकधारी , हे भुजङ्गधर।
हे ! रुद्राक्ष,  हे ! दयानिधि,  महायोगी  हे ! महेश्वर।
हे ! दुर्जय, हे ! देवाधिदेव ,  हे ! सनातन हे ! सर्वेश्वर।
भैरव , हे ! पार्वतीपति , दक्ष-दर्पहर हे ! विश्वेश्वर।
हे ! अबिनासी , हे ! सन्यासी, हे ! वेदरूप , जय शिवशंकर।
हे ! रूद्र हे ! पुष्कर हे ! निर्गुण , जय हे ! हर-हर।
हे ! अज ,अन्नत, हे ! अखिलेश्वर हे ! निर्विकार हे ! शशिशेखर।


कामी , लोलुप, व्यभिचारी, लम्पट, विषयी , दुराचारी।
आतंकी , दुष्ट , अत्याचारी , निरंकुश हठी भृष्टाचारी।
हर गली, द्वारे, चौबारे, हर नुक्कड़ दुराहे , चौराहे।
मंदिर, मस्जिद  घूम  रहे  गिरिजा - गिरिजा गुरद्वारे।

जाति - धर्म और भेद-भाव,
भाषा ,रंगरूप और प्रांतवाद।
यह वर्णभेद और ऊँच - नीच ,
निर्धन, धनवान का द्वेष बीज।
बढ़ता जाता मुख सुरसा सा ,
आतंकी , दुष्ट भस्मासुर सा।
सम दुष्ट  दुःशासन, दुर्योधन ,
छद्म भेषधारी दुर्जन।
शिशुपाल, जरासंध सा पापी
रावण सा संत संतापी।

न द्रौपदी कोई सुरक्षित है।
न अब कोई पुत्र - परीक्षित है।
न राम - कृष्ण , न परसुराम।
न संकटमोचक हनुमान।


अब एक सहारा तुम्ही नाथ,
 अब दे दो सहारा बढ़ा हाथ।
धर रौद्र रूप फिर से आओ।
हे ! तांडवकारी  फिर से आओ।
डम - डम डमरू का घोर नाद।
बम - बम भोले  कर शंखनाद।
भस्मासुर संहारी फिर से आओ।
हे ! घोर अघोरी फिर आओ।
हे ! प्रलयंकर, हे! महाकाल ,
श्मशान - निवासी भूतनाथ।
 मुण्डमाल -धर फिर आओ।
हे ! उमेश फिर से आओ।
अब नयन उघाड़ो मदनारि।
हे ! त्रिलोकपति, हे ! त्रिपुरारि।


धग्द - धग्द ज्वाल से , कराल कोटि काल से ,
खड़ग ले , त्रिशूल ले, गरुड़  से टूट पर झुण्ड पर ब्याल के।
मुण्डधर फिर बनो खंड - खंड फिर करो ,
कर में कपाल ले महाकाल फिर बनो।
रक्तबीज को बधो,
महाभूत हे ! प्रभो।

संग ले, ताल बेताल योगिनी, विकराल  भाल डाकिनी।
निर्मुंड , मुंड पिशाचनी , लोहित पिपासु शाकिनी
विकराल , काल फिर बनो , अकाल काल फिर बनो।
महाकाल फिर बनो , हे ! महाकाल फिर बनो ।




  


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