Saturday, 11 July 2015

यमराज से टक्कर





एक दिन यमराज से,  टकरा गया मैं ।
थोड़ा झिझका, डरा और घबरा गया मैं । 

मैंने पूंछा ," भाई आप कौन हैं ?

ऐसे खड़े हैं क्योँ मौन हैं "?

मुस्करा कर बोले वह," मुझे नहीं पहचानते हो ?

क्या वास्तव में मुझे नहीं जानते हो ?"

मैंने अपनी अक्ल के दौड़ाए  घोड़े,

ठोड़ी  खुजाई , भौहें सिकोड़ी , थोड़े होंठ मोड़े। 

ताका आकाश को , कुछ बुदबुदाया। 

इधर उधर देखा और सिर  खुजाया। 

बोला ," क्या किसी तबेले से आ रहे हो ?

भटके हुए राही हैं, या कहीं जा रहे हो ?"

वह बोले ," वत्स ! यमराज है, हम। 
यमपुरी के महाराज हैं, हम। 

यमदंडधारी, मृत्यु के स्वामी हमी  हैं। 

अब तो मन में कोई शंका नहीं हैं ?"

सुनकर उनकी बात, डर कर दूर भागा। 

सोंचा , क्या टकराने को  लिए मैं ही बचा था, अभागा ?

वह बोले ," डरो नहीं वत्स ! तेरा नम्बर नहीं ,

यम हैं हम,  यह भी सही हैं । "

डर दूर भागा, उनकी यह बात सुनकर। 

हम भी खड़े हो गए, कुछ अस्वस्त होकर। 

"झूठे , फरेबी , मक्कार , धोकेबाज,  जो नेता हमको लूटते हैं ?

खटमल, पिस्सुओं जैसे खून चूसते हैं। 

या इलाज़ के नाम पर ठगने बाले डॉक्टर। 

क्या उनका है नंबर ?

या स्वछन्द जो घूमते क़ातिल, लुटेरे ?

या भ्रष्ट रिश्वतखोर जो हैं घनेरे ?"

वह बोले ,"व्यापम की वजह से अभी फुर्सत नहीं है,

अभी इनका नम्बर नहीं है। 






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