Sunday, 12 July 2015

पेन्सिल रानी








सुनो ! सुनो ! मेरी कहानी, मेरी कहानी मेरी जुबानी।
मैं थी पेड़ एक जंगल का, जंगल में मुझको मंगल था।
झूम - झूम कर मैं इठलाती , मुझे गोद  में पवन झूलती।
खुली हवा में लेती सांसें , गाती गीत और करती बातें।


शेर , लोमड़ी , बंदर मामा, उछल- कूद करता हंगामा।
कालू भालू, चीता, हाथी, थे जंगल में संगी - साथी।
तोता , कोयल , मैना, मोर , खूब मचाते मिलकर शोर।

एक दिन आया मोटा लाला, बड़ी तोंद और चश्मा काला।
गोल - मटोल था जैसे आलू , चले ठुमककर जैसे भालू।
मुझे देखकर वह मुस्काया , मुझपर उसने तरस न खाया।

मैं बहुत रोई चिल्लाई , मदद - मदद आवाज़ लगाई।
छूट गए सब संगी - साथी , बंदर, भालू, चीता, हाथी
छोटे टुकड़ों में कटवाया , काट - छांट कर मुझे सुखाया।

डाली बत्ती रंगबिरंगी , हरी, लाल , पीली,  नारंगी।
आसमानी , नीली , बैगनी, रंगभरी जैसे सतरंगी।
नया रूप देखा शरमाई ,अपनी किस्मत पर इतराई।


                                               
                                                    चिंटू , पिंटू , मिंटू , बबली , अंजू , मंजू , बिट्टू लवली।
जुड़ गया मेरा सबसे नाता , लिखे लेख कोई चित्र बनाता।
प्यारी मैं बन गयी सबकी, बंटू , डोली , रोली , छुटकी।

बच्चो ! अगर कुछ पाना है, दुःख - कष्टोँ से न घबराना है.
लालाजी की मैं आभारी , जिसने मेरी किस्मत संभारी।
पूरी हुई मेरी कहानी, मैं हूँ तुम्हारी पेंसिल रानी।





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