हे ! जटाजूट, कर्पूरगौर, हे ! कैलाशपति, केदारनाथ।
शूलपाणि, हे ! शिव शम्भू, हे ! विश्वनाथ, हे ! नागेश्वर।
हे ! कृपालु हे ! गंगाधर , हे चंद्रमौलि, बाघम्बरधर।
हे ! अभयङ्कर , त्रयंबकेश्वर , हे ! कामारि, हे ! घुश्मेश्वर।
हे ! नीलकंठ हे ! नागनाथ , हे !सोमनाथ हे ! भस्मेश्वर।
हे ! बैद्यनाथ , हे ! सतीपति, हे !गौरानाथ, हे ! नंदेश्वर।
हे ! अंनग-रिपु , हे ! त्रिलोचन, हे ! डमरूधर हे! भीमेश्वर ।
हे ! मृत्युञ्जय हे ! महादेव , हे ! चिदानंद जय विश्वम्भर।
हे ! आशुतोष, हे ! लिंगराज, हे ! पशुपति हे ! परमेश्वर।
हे ! उमापति, हे ! बृषवाहन, पिनाकधारी , हे भुजङ्गधर।
हे ! रुद्राक्ष, हे ! दयानिधि, महायोगी हे ! महेश्वर।
हे ! दुर्जय, हे ! देवाधिदेव , हे ! सनातन हे ! सर्वेश्वर।
भैरव , हे ! पार्वतीपति , दक्ष-दर्पहर हे ! विश्वेश्वर।
हे ! अबिनासी , हे ! सन्यासी, हे ! वेदरूप , जय शिवशंकर।
हे ! रूद्र हे ! पुष्कर हे ! निर्गुण , जय हे ! हर-हर।
हे ! अज ,अन्नत, हे ! अखिलेश्वर हे ! निर्विकार हे ! शशिशेखर।
कामी , लोलुप, व्यभिचारी, लम्पट, विषयी , दुराचारी।
आतंकी , दुष्ट , अत्याचारी , निरंकुश हठी भृष्टाचारी।
हर गली, द्वारे, चौबारे, हर नुक्कड़ दुराहे , चौराहे।
मंदिर, मस्जिद घूम रहे गिरिजा - गिरिजा गुरद्वारे।
जाति - धर्म और भेद-भाव,
भाषा ,रंगरूप और प्रांतवाद।
यह वर्णभेद और ऊँच - नीच ,
निर्धन, धनवान का द्वेष बीज।
बढ़ता जाता मुख सुरसा सा ,
आतंकी , दुष्ट भस्मासुर सा।
सम दुष्ट दुःशासन, दुर्योधन ,
छद्म भेषधारी दुर्जन।
शिशुपाल, जरासंध सा पापी
रावण सा संत संतापी।
न द्रौपदी कोई सुरक्षित है।
न अब कोई पुत्र - परीक्षित है।
न राम - कृष्ण , न परसुराम।
न संकटमोचक हनुमान।
अब एक सहारा तुम्ही नाथ,
अब दे दो सहारा बढ़ा हाथ।
धर रौद्र रूप फिर से आओ।
हे ! तांडवकारी फिर से आओ।
डम - डम डमरू का घोर नाद।
बम - बम भोले कर शंखनाद।
भस्मासुर संहारी फिर से आओ।
हे ! घोर अघोरी फिर आओ।
हे ! प्रलयंकर, हे! महाकाल ,
श्मशान - निवासी भूतनाथ।
मुण्डमाल -धर फिर आओ।
हे ! उमेश फिर से आओ।
अब नयन उघाड़ो मदनारि।
हे ! त्रिलोकपति, हे ! त्रिपुरारि।
धग्द - धग्द ज्वाल से , कराल कोटि काल से ,
खड़ग ले , त्रिशूल ले, गरुड़ से टूट पर झुण्ड पर ब्याल के।
मुण्डधर फिर बनो खंड - खंड फिर करो ,
कर में कपाल ले महाकाल फिर बनो।
रक्तबीज को बधो,
महाभूत हे ! प्रभो।
संग ले, ताल बेताल योगिनी, विकराल भाल डाकिनी।
निर्मुंड , मुंड पिशाचनी , लोहित पिपासु शाकिनी
विकराल , काल फिर बनो , अकाल काल फिर बनो।
महाकाल फिर बनो , हे ! महाकाल फिर बनो ।
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bahut hi bhari -bharcam kavita.shabd jal mein hi ulajh gayi.sundar soch.vipul shabd bhandar.congrats.i like this.
ReplyDeleteDhanyawaad Anty. Bas thadi koshish kar raha hun
DeleteDhanyawaad Anty. Bas thadi koshish kar raha hun
Deletesirji.....too heavy....too good....keep it up
ReplyDeleteBas Anupam aapke dikhaye raste per chal pada houn. Thanx for liking
ReplyDeleteBas Anupam aapke dikhaye raste per chal pada houn. Thanx for liking
ReplyDeletebhagvan ka aashirvad aour uski mahnat.vahi rah dikhate rahen!!
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