Sunday, 5 July 2015

महाकाल फिर बनो




हे ! जटाजूट, कर्पूरगौर, हे ! कैलाशपति,  केदारनाथ।
शूलपाणि, हे ! शिव शम्भू,  हे ! विश्वनाथ,  हे ! नागेश्वर।
हे ! कृपालु  हे ! गंगाधर , हे चंद्रमौलि, बाघम्बरधर।
हे ! अभयङ्कर , त्रयंबकेश्वर , हे ! कामारि, हे ! घुश्मेश्वर।
हे ! नीलकंठ  हे ! नागनाथ ,  हे !सोमनाथ  हे !  भस्मेश्वर।
हे ! बैद्यनाथ , हे ! सतीपति,  हे !गौरानाथ,  हे ! नंदेश्वर।
हे ! अंनग-रिपु , हे ! त्रिलोचन,  हे ! डमरूधर हे! भीमेश्वर ।
हे ! मृत्युञ्जय हे ! महादेव , हे ! चिदानंद जय विश्वम्भर।
हे !  आशुतोष, हे ! लिंगराज, हे ! पशुपति  हे ! परमेश्वर।
हे ! उमापति, हे ! बृषवाहन, पिनाकधारी , हे भुजङ्गधर।
हे ! रुद्राक्ष,  हे ! दयानिधि,  महायोगी  हे ! महेश्वर।
हे ! दुर्जय, हे ! देवाधिदेव ,  हे ! सनातन हे ! सर्वेश्वर।
भैरव , हे ! पार्वतीपति , दक्ष-दर्पहर हे ! विश्वेश्वर।
हे ! अबिनासी , हे ! सन्यासी, हे ! वेदरूप , जय शिवशंकर।
हे ! रूद्र हे ! पुष्कर हे ! निर्गुण , जय हे ! हर-हर।
हे ! अज ,अन्नत, हे ! अखिलेश्वर हे ! निर्विकार हे ! शशिशेखर।


कामी , लोलुप, व्यभिचारी, लम्पट, विषयी , दुराचारी।
आतंकी , दुष्ट , अत्याचारी , निरंकुश हठी भृष्टाचारी।
हर गली, द्वारे, चौबारे, हर नुक्कड़ दुराहे , चौराहे।
मंदिर, मस्जिद  घूम  रहे  गिरिजा - गिरिजा गुरद्वारे।

जाति - धर्म और भेद-भाव,
भाषा ,रंगरूप और प्रांतवाद।
यह वर्णभेद और ऊँच - नीच ,
निर्धन, धनवान का द्वेष बीज।
बढ़ता जाता मुख सुरसा सा ,
आतंकी , दुष्ट भस्मासुर सा।
सम दुष्ट  दुःशासन, दुर्योधन ,
छद्म भेषधारी दुर्जन।
शिशुपाल, जरासंध सा पापी
रावण सा संत संतापी।

न द्रौपदी कोई सुरक्षित है।
न अब कोई पुत्र - परीक्षित है।
न राम - कृष्ण , न परसुराम।
न संकटमोचक हनुमान।


अब एक सहारा तुम्ही नाथ,
 अब दे दो सहारा बढ़ा हाथ।
धर रौद्र रूप फिर से आओ।
हे ! तांडवकारी  फिर से आओ।
डम - डम डमरू का घोर नाद।
बम - बम भोले  कर शंखनाद।
भस्मासुर संहारी फिर से आओ।
हे ! घोर अघोरी फिर आओ।
हे ! प्रलयंकर, हे! महाकाल ,
श्मशान - निवासी भूतनाथ।
 मुण्डमाल -धर फिर आओ।
हे ! उमेश फिर से आओ।
अब नयन उघाड़ो मदनारि।
हे ! त्रिलोकपति, हे ! त्रिपुरारि।


धग्द - धग्द ज्वाल से , कराल कोटि काल से ,
खड़ग ले , त्रिशूल ले, गरुड़  से टूट पर झुण्ड पर ब्याल के।
मुण्डधर फिर बनो खंड - खंड फिर करो ,
कर में कपाल ले महाकाल फिर बनो।
रक्तबीज को बधो,
महाभूत हे ! प्रभो।

संग ले, ताल बेताल योगिनी, विकराल  भाल डाकिनी।
निर्मुंड , मुंड पिशाचनी , लोहित पिपासु शाकिनी
विकराल , काल फिर बनो , अकाल काल फिर बनो।
महाकाल फिर बनो , हे ! महाकाल फिर बनो ।




  


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7 comments:

  1. bahut hi bhari -bharcam kavita.shabd jal mein hi ulajh gayi.sundar soch.vipul shabd bhandar.congrats.i like this.

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    1. Dhanyawaad Anty. Bas thadi koshish kar raha hun

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    2. Dhanyawaad Anty. Bas thadi koshish kar raha hun

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  2. sirji.....too heavy....too good....keep it up

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  3. Bas Anupam aapke dikhaye raste per chal pada houn. Thanx for liking

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  4. Bas Anupam aapke dikhaye raste per chal pada houn. Thanx for liking

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  5. bhagvan ka aashirvad aour uski mahnat.vahi rah dikhate rahen!!

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